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Showing posts with the label Inspirational stories

सभी की खुशिओं पर आपकी ख़ुशी निर्भर करती है

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सार्थक उदाहरण

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शिष्य की पहचान

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बहू की चतुराई

एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर नौकरी में लगते गये। सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे। बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी। उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने। सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया।जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छः चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपन...

संवेदनशीलता एक आभूषण

एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,"चिट्ठी ले लीजिये।"अंदर से एक बालिका की आवाज आई,"आ रही हूँ।"लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,"अरे भाई!मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।"लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।"पोस्टमैन ने कहा,"नहीं,मैं खड़ा हूँ,रजिस्टर्ड चिट्ठी है,पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।"करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला।पोस्टमैन इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही,लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया,सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे,सामने खड़ी थी।पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया।हफ़्ते,दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती,पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता।एक दिन उसने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा।दीपावली नजदीक आ रही थी।उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के ...

निश्चय कर अपनी जीत करौं

एक युवा हो रहे किशोर ने एक धनी व्यक्ति का ठाठ-बाट देखा ?। उसने सोचा धनवान बनना चाहिए। कई दिन तक उसी की तरह कमाई में लगने का प्रयास किया भी और कुछ पैसे कमा भी लिए। इसी बीच उसकी भेंट एक विद्वान से हुई। उसने विद्वान की विद्वता-वाक्पटुता से प्रभावित होकर कमाई करना छोड़ दिया और पढ़ने में लग गया। अभी थोड़ा बहुत सीख ही पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हो गई। उसे संगीत में अधिक आकर्षण लगा। उस दिन से पढ़ाई बंद कर उसने संगीत सीखना आरंभ कर दिया। काफी उम्र बीतने पर भी न वह पैसे वाला बना, न विद्वान, न संगीतज्ञ, न समाजसेवी या नेता। एक दिन अपने दुख के कारण उसने एक महात्मा को बताया। उनने कहा-“बेटा! सारी दुनिया में आकर्षण भरा पड़ा है। एक निश्चय करो और फिर जीते जी उसी पर अमल करो, तुम्हारी उन्नति अवश्य होगी। कई जगह गड्ढे खोदोगे तो न पानी मिलेगा, न कुआँ खोद पाओगे।” युवक संकेत समझ गया और एक निष्ठ भाव से लग गया।

अस्त्र जिनसे बुरे- से- बुरे स्वभाव के दुष्ट मनुष्यों को भी परास्त होना पड़ता है - A must Read Inspiring Story in Hindi

एक राजा ने एक दिन स्वप्न देखा कि कोई परोपकारी साधु उससे कह रहा है कि बेटा ! कल रात को तुझे एक विषैला सर्प काटेगा और उसके काटने से तेरी मृत्यु हो जायेगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है, पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेने के लिए वह तुम्हें काटेगा। प्रातःकाल राजा सोकर उठा और स्वप्न की बात पर विचार करने लगा। धर्मात्माओं को अक्सर सच्चे ही स्वप्न हुआ करते हैं। राजा धर्मात्मा था, इसलिए अपने स्वप्न की सत्यता पर उसे विश्वास था। वह विचार करने लगा कि अब आत्म- रक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुँचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया। संध्या होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह- जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाने या छेड़- छाड़ करने का प्रयत्न न करे। रात को ठीक बारह बजे सर्प अपनी बाँबी म...

प्रेम की भाषा है - An Inspiring Story

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एक बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता ।अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता, "ये कम मीठा लग रहा है, देखो !" बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!" वो उस संतरे को वही छोड़, बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता। युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा "ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?" युवा ने पत्नी को एक मघुर मुस्कान के साथ बताया "वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती, इस तरह उसे मै संतरा खिला देता हूँ । एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया, ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चक चक करता है, पर संतरे तौलते मै तेरे पलड़े देखती हूँ, तू हमेशा उसकी चक चक में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है । बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा "उसकी चक चक संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है। मै बस उसका प्रेम देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।" प्रेम की अपनी भाषा है ।...

कर्म क्या है ? ये कैसे कार्य करता है ? - KARMA STORY

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था। उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी। तब उस साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला। तब राजा का रसोईया खुले आँगन में जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई। किसी को कुछ पता नहीं चला। फलस्वरूप उन सब ब्राह्मणो की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी। जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्महत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ। ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा .... ??? (1) राजा .... जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है .... या (2 ) रसोईया .... जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है .... या (3) वह चील .... जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी .... या (4) वह साँप .... जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला .... बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) र...

नामी से नाम बड़ा - Inspiring Story for the youth of India

एक दिन देवर्षि नारद ने भगवान श्री राम के दरबार में एक प्रश्न उठाया कि नाम और नामी में कौन श्रेष्ठ है ? ऐसे प्रश्न को सुनकर उपस्थित ऋषियों ने कहा - नारद जी! नामी से तुम्हारा क्या तात्पर्य है, स्पष्ट करो। नारद जी ने कहा - ऋषियों नाम तथा नामी से तात्पर्य है कि भगवान नाम का जप-भजन श्रेष्ठ है या स्वयं भगवान श्रेष्ठ हैं ? नारद जी की बात सुनकर ऋषियों ने हंसकर कहा - अरे नारद! तुमने यह कैसे बच्चों जैसा प्रश्न किया है। निश्चय ही भगवान श्रेष्ठ हैं क्योंकि उन्हीं के नाम का तो जप किया जाता है। नारद ने कहा - नहीं आपकी यह धारणा ठीक नहीं है। मेरे विचार से भगवान से बढ़कर उनका नाम है। भक्त को भगवान के नाम के जप से ही शक्ति मिलती है। क्योंकि नाम के भजन के बिना भगवान कहाँ कृपा करते हैं। पर यह बात सबने आसानी से स्वीकार नहीं की तो नारद ने कहा - अपने मत की प्रतिष्ठा के लिए मैं इसे उचित समय पर प्रमाणित करूंगा। इसके कुछ देर बाद राजदरबार स्थगित हो गया। हनुमान जी उस दिन दरबार में उपस्थित नहीं थे इसलिए हुनमान जी को इस विवाद के बारे में कुछ नहीं पता था। दूसरे दिन राजदरबार लगने से पहले नारद ने हनुमान जी को...

श्रद्धा और भक्ति - Inspiring story for the Young India

एक समय अयोध्या के पहुंचे हुए संत श्री रामायण कथा सुना रहे थे। रोज एक घंटा प्रवचन करते कितने ही लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एकदिन तर्कशीलता हावी हो गई । उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे ! अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला- महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ? साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं । वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए । आप लोगों को प्रवचन सुना रहे हैं सो तो अच्छा है लेकिन अपने पास हनुमान जी की उपस्थिति बताकर आप अनुचित तरीके से लोगों को प्रभावित कर रहे हैं । आप...

जीवन के शिल्पकार

एक थका-माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया।अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उस शिल्पकार ने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, सामने रखा और थैले से छेनी-हथौड़ी निकाली ! उसे तराशने की ग़रज़ से जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा:- “ अरे मुझे मत मारो।”   शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया और पास ही पड़े अपनी पसंद का एक अन्य टु कड़ा उठाया और उसे छैनी - हथौड़ी से तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उस पत्थर के टुकड़े मे से एक देवी की प्रतिमा उभर आई।   उस प्रतिमा को वहीं पेड़ के नीचे रख वह शिल्पकार अपनी राह पकड़ आगे चला गया। कुछ वर्षों बाद वो शिल्पकार फिर उसी रास्ते से गुजरा तो देखा कि उसकी बनाई उस मूर्ती की पूजा अर्चना हो रही है,और जिस पत्थर के टुकड़े को उसने उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ती पर चढ़ा रहे है।   यह छोटी सी कहानी हमें बताती है कि --  "जीवन में कुछ बनने के लिए जो व्यक्ति शुरु में अपने जीवन के शिल्पकार (माता...

उपलों से कृष्ण का नाम निकलता

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एक गाँव में एक वृद्ध स्त्री रहती थीं । उसका कोई नहीं था, वो गोबर के उपले बनाकर बेचती थी और उसी से अपना गुजारा चलाती थीं | पर उस स्त्री की एक विशेषता थी वो कृष्ण भक्त थीं , उठते बैठते कृष्ण नामजप किया करती थीं यहाँ तक उपले बनाते समय भी | उस गाँव के कुछ दुष्ट लोग उसकी भक्ति का उपहास करते और एक दिन तो उन दुष्टों ने एक रात उस वृद्ध स्त्री के सारे उपले चुरा लिए और आपस में कहने लगे कि अब देखें कृष्ण कैसे इसकी सहयता करते हैं | सुबह जब वह उठीं तो देखती है कि सारे उपले किसी ने चुरा लिए | वे मन ही मन हंसने लगी और अपने कान्हा को कहने लगीं , “पहले माखन चुराता था और मटकी फोड़ गोपियों को सताता था अब इस बुढ़िया के उपले छुपा मुझे सताता है, ठीक है जैसी तेरी इच्छा” यह कहउसने अगले दिन के लिए उपले बनाना आरंभ कर दिये | दोपहर हो चली तो भूख लग गयी पर घर में कुछ खाने को नहीं था, दो गुड की डली थीं अतः एक अपने मुह में डाल पानी के कुछ घूंट ले लेटने चली गयी | भगवान तो भक्त वत्सल होते हैं अतः अपने भक्त को कष्ट होता देख वे विचलित हो जाते हैं , उनसे उस वृद्ध साधिका के कष्ट सहन नहीं हो पाये |  सोचा उसक...

भगवान् जल्दी कैसे मिलें ?

एक साधु थे । उनके पास एक आदमी आया और उसने पूछा कि भगवान् जल्दी कैसे मिलें ? साधु ने कहा कि भगवान् उत्कट चाहना होने से मिलेंगे । उसने पूछा कि उत्कट चाहना कैसी होती है ? साधु ने कहा कि भगवान् के बिना रहा न जाये। वह आदमी ठीक समझा नहीं और बार-बार पूछता रहा कि उत्कट चाहना कैसी होती है ? एक दिन साधु ने उस आदमी से कहा कि आज तुम मेरे साथ नदी में स्नान करने चलो । दोनों नदी में गये और स्नान करने लगे । उस आदमी ने जैसे ही नदी में डुबकी लगायी, साधु ने उसका गला पकड़कर नीचे दबा दिया । वह आदमी थोड़ी देर नदी के भीतर छटपटाया, फिर साधु ने उसको छोड़ दिया । पानी से ऊपर आने पर वह बोला कि तुम साधु होकर ऐसा काम करते हो ! मैं तो आज मर जाता ! साधु ने पूछा कि बता, तेरे को क्या याद आया ? माँ याद आयी, बाप याद आया या स्त्री-पुत्र याद आये ? वह बोला कि महाराज, मेरे तो प्राण निकले जा रहे थे, याद किसकी आती ? साधु बोले कि तुम पूछते थे कि उत्कट अभिलाषा कैसी होती है, उसी का नमूना मैंने तेरे को बताया है । जब एक भगवान् के सिवाय कोई भी याद नहीं आयेगा और उनकी प्राप्ति के बिना रह नहीं सकोगे, तब भगवान् मिल जायेंगे। भगवान् की त...

पाप कहाँ जाता है?

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी । अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है ? तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए , ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ? भगवन ने कहा कि चलो गंगा से ही पूछते है , दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि , हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई । गंगा ने कहा मैं क्यों पापी हुई , मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ , …..अब वे लोग समुद्र के पास गए , हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए । समुद्र ने कहा मैं क्यों पापी हुआ , मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ । …..अब वे लोग बादल के पास गए, हे बादलों ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है , तो इसका मतलब आप पापी हुए ।  बादलों ने कहा मैं क्यों पापी हुआ , मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ , जिससे अन्न उपजता है , जिसको मानव खाता है ।...

मनुष्य में होना चाहिए सुलझा हुआ दृष्टिकोण

ये कहानी जरूर पढ़े, यक़ीनन आपकी सोच बदल देगी… रेगिस्तानी मैदान से एक साथ कई ऊंट अपने मालिक के साथ जा रहे थे। अंधेरा होता देख मालिक ने एक सराय में रुकने का आदेश दे दिया। निन्यानवे ऊंटों को जमीन में खूंटियां गाड़कर उन्हें रस्सियों से बांध दिया मगर एक ऊंट के लिए खूंटी और रस्सी कम पड़ गई। सराय में खोजबीन की , पर व्यवस्था हो नहीं पाई। तब सराय के मालिक ने सलाह दी कि तुम खूंटी गाड़ने जैसी चोट करो और ऊंट को रस्सी से बांधने का अहसास करवाओ। यह बात सुनकर मालिक हैरानी में पड़ गया , पर दूसरा कोई रास्ता नहीं था , इसलिए उसने वैसा ही किया। झूठी खूंटी गाड़ी गई , चोटें की गईं। ऊंट ने चोटें सुनीं और समझ लिया कि बंध चुका है। वह बैठा और सो गया। सुबह निन्यानबे ऊंटों की खूटियां उखाड़ीं और रस्सियां खोलीं , सभी ऊंट उठकर चल पड़े , पर एक ऊंट बैठा रहा। मालिक को आश्चर्य हुआ – अरे , यह तो बंधा भी नहीं है , फिर भी उठ नहीं रहा है। सराय के मालिक ने समझाया – तुम्हारे लिए वहां खूंटी का बंधन नहीं है मगर ऊंट के लिए है। जैसे रात में व्यवस्था की , वैसे ही अभी खूंटी उखाड़ने और बंधी रस्सी खोलने का अहसास करवाओ। मालिक ने ख...

संगठन में शक्ति होती है

एक बार हाथ की पाँचों उंगलियों में आपस में झगड़ा हो गया| वे पाँचों खुद को एक दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में लगे थे | अंगूठा बोला की मैं सबसे बड़ा हूँ, उसके पास वाली उंगली बोली मैं सबसे बड़ी हूँ इसी तरह सारे खुद को बड़ा सिद्ध करने में लगे थे जब निर्णय नहीं हो पाया तो वे सब अदालत में गये | न्यायाधीश ने सारा माजरा सुना और उन पाँचों से बोला की आप लोग सिद्ध करो की कैसे तुम सबसे बड़े हो? अंगूठा बोला मैं सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा हूँ क्यूंकि लोग मुझे हस्ताक्षर के स्थान पर प्रयोग करते हैं| पास वाली उंगली बोली की लोग मुझे किसी इंसान की पहचान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं| उसके पास वाली उंगली ने कहा की आप लोगों ने मुझे नापा नहीं अन्यथा मैं ही सबसे बड़ी हूँ | उसके पास वाली उंगली बोली मैं सबसे ज़्यादा अमीर हूँ क्यूंकि लोग हीरे और जवाहरात की अंगूठी मुझी में पहनते हैं| इस तरह सभी ने अपनी अलग अलग प्रशंसा की | न्यायाधीश ने अब एक रसगुल्ला मंगाया और अंगूठे से कहा कि इसे उठाओ, उंगुठे ने भरपूर ज़ोर लगाया लेकिन रसगुल्ले को नहीं उठा सका | इसके बाद सारी उंगलियों ने एक एक करके कोशिश की लेकिन सभी विफल रहे| अ...

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना

बहुत समय पहले की बात है किसी गाँव में मोहन नाम का एक किसान रहता था . वह बड़ा मेहनती और ईमानदार था । अपने अच्छे व्यवहार के कारण दूर -दूर तक उसे लोग जानते थे और उसकी प्रशंशा करते थे । पर एक दिन जब देर शाम वह खेतों से काम कर लौट रहा था तभी रास्ते में उसने कुछ लोगों को बाते करते सुना , वे उसी के बारे में बात कर रहे थे । मोहन अपनी प्रशंशा सुनने के लिए उन्हें बिना बताये धीरे -धीरे उनके पीछे चलने लगा , पर उसने उनकी बात सुनी तो पाया कि वे उसकी बुराई कर रहे थे , कोई कह रहा था कि , “ मोहन घमण्डी है .” , तो कोई कह रहा था कि ,” सब जानते हैं वो अच्छा होने का दिखावा करता है …” मोहन ने इससे पहले सिर्फ अपनी प्रशंशा सुनी थी पर इस घटना का उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ा और अब वह जब भी कुछ लोगों को बाते करते देखता तो उसे लगता वे उसकी बुराई कर रहे हैं . यहाँ तक कि अगर कोई उसकी तारीफ़ करता तो भी उसे लगता कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है . धीरे -धीरे सभी ये महसूस करने लगे कि मोहन बदल गया है , और उसकी पत्नी भी अपने पति के व्यवहार में आये बदलाव से दुखी रहने लगी और एक दिन उसने पूछा , “ आज -कल आप इतने परेशान क्यो...

सेवा करो ;यही मनुष्य के जीवन का मुख्य कार्य है !

एक बार गुरु नानक देव जी जगत का उद्धार करते हुए एक गाँव के बाहर पहुँचे ;देखा वहाँ एक झोपड़ी बनी हुई थी ! उस झोपड़ी में एक आदमी रहता था जिसे कुष्‍ठ-रोग था !गाँव के सारे लोग उससे नफरत करते ;कोई उसके पास नहीं आता था !कभी किसी को दया आ जाती तो उसे खाने के लिये कुछ दे देते अन्यथा भूखा ही पड़ा रहता ! नानक देव जी उस कोढ़ी के पास गये और कहा -भाई हम आज रात तेरी झोपड़ी में रहना चाहते है अगर तुम्हे कोई परेशानी ना हो तो ?कोढ़ी हैरान हो गया क्योंकि उसके तो पास भी कोई आना नहीं चाहता था फिर उसके घर में रहने के लिये कोई राजी कैसे हो गया ? कोढ़ी अपने रोग से इतना दुखी था कि चाह कर भी कुछ ना बोल सका ;सिर्फ नानक देव जी को देखता ही रहा !लगातार देखते-देखते ही उसके शरीर में कुछ बदलाव आने लगे पर कुछ कह नहीं पा रहा था ! नानक देव जी ने मरदाना को कहा -रबाब बजाओ !नानक देव जी ने उस झोपड़ी में बैठ कर कीर्तन करना आरम्भ कर दिया !कोढ़ी ध्यान से कीर्तन सुनता रहा !कीर्तन समाप्त होने पर कोढ़ी के हाथ जुड़ गये जो ठीक से हिलते भी नहीं थे !उसने नानक देव जी के चरणों में अपना माथा टेका ! नानक देव जी ने कहा -और भाई ठीक हो ;य...

माँ तो माँ होती है। क्या मेरी, क्या तेरी ?

पति के घर में प्रवेश करते ही पत्नी का गुस्सा फूट पड़ा : “पूरे दिन कहाँ रहे ? आफिस में पता किया, वहाँ भी नहीं पहुँचे । मामला क्या है?” “वो-वो… मैं…” पति की हकलाहट पर झल्लाते हुए पत्नी फिर बरसी, “बोलते नही? कहां चले गये थे। ये गंन्दा बक्सा और कपड़ों की पोटली किसकी उठा लाये ?” “वो मैं माँ को लाने गाँव चला गया था।” पति थोड़ी हिम्मत करके बोला। “क्या कहा ? तुम्हारी मां को यहां ले आये ? शर्म नहीं आई तुम्हें ? तुम्हारे भाईयों के पास इन्हे क्या तकलीफ है ?” आग बबूला थी पत्नी l उसने पास खड़ी फटी सफेद साड़ी से आँखें पोंछती बीमार वृद्धा की तरफ देखा तक नहीं। “इन्हें मेरे भाईयों के पास नहीं छोड़ा जा सकता। तुम समझ क्यों नहीं रहीं।” पति ने दबीजुबान से कहा। “क्यों, यहाँ कोई कुबेर का खजाना रखा है ? तुम्हारी सात हजार रूपल्ली की पगार में बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च कैसे चला रही हूँ, मैं ही जानती हूँ!” पत्नी का स्वर उतना ही तीव्र था। “अब ये हमारे पास ही रहेगी।” पति ने कठोरता अपनाई। “मैं कहती हूँ, इन्हें इसी वक्त वापिस छोड़ कर आओ। वरना मैं इस घर में एक पल भी नहीं रहूंगी और इन महारा...